उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय के हिंदी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग द्वारा आज कहानी पाठ और परिचर्चा का आयोजन विश्वविद्यालय में किया गया
उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय के हिंदी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग द्वारा आज कहानी पाठ और परिचर्चा का आयोजन विश्वविद्यालय में किया गया
/ March 24, 2026
Submitted by
pawankumar
on March 24, 2026
हमें पढ़ने की संस्कृति को विकसित करना होगा। : प्रो. नवीन चन्द्र लोहनी, माननीय कुलपति
उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय के हिंदी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग द्वारा आज कहानी पाठ और परिचर्चा का आयोजन विश्वविद्यालय में किया गया।
आयोजन में अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. नवीन चन्द्र लोहनी ने कहा कि विश्वविद्यालय में रचनात्मक अवसर सृजित होने चाहिए। उन्होंने कहा कि इस तरह के आयोजन रचनाओं का तटस्थ मूल्यांकन करती है। यह आयोजन रचनात्मक हस्तक्षेप है जो जीवन की एकरसता को तोड़ कर सृजनात्मकता को बढ़ाएगा। कुलपति महोदय ने कहानीकारों को शुभकामनाएं देते हुए कहा यहां पढ़ी गई दोनों कहानियां हमारे समय का विश्वसनीय क्रिटिक रचती हैं। ये कहानियां बदलते समय का साहित्यिक साक्ष्य रचती हैं।
कार्यक्रम का विषय प्रवेश करते हुए हिंदी विभाग के सहायक प्राध्यापक एवं आलोचक डॉ. राजेंद्र कैड़ा ने कहा कि कविता जीवन के आगे पीछे चलती है और कहानी जीवन के समानांतर। कहानियां पढ़ते सुनते हुए पहली ही पंक्ति से पाठक एक संलग्नता महसूस करता है। आज की कहानी हमारे समय का यथार्थ चित्रण करने में सफल हुई हैं।
कार्यक्रम की शुरुआत कथाकार श्रीकांत दुबे की कहानी गमलबानी के पाठ से हुआ। इस कहानी में मध्यवर्गीय शहरी जीवन की अभिव्यक्ति हुई है जिसमें दिनचर्या के छोटे छोटे दृश्य से आख्यान रचा गया है।
इसके पश्चात् शशांक शुक्ल जी ने कमेटी में आचार्य कहानी का पाठ किया। यह कहानी विश्वविद्यालय के महत्वाकांक्षा और सफलता के पीछे की मनुष्यता के छीजने की है।
कार्यक्रम के दूसरे हिस्से यानी परिचर्चा सत्र की शुरुआत बरेली के युवा कवि आलोचक संदीप तिवारी ने कहा कि कहानी अपने सूक्ष्म विवरण से बड़ी बनती है। गमलबानी में मिट्टी की समस्या महानगरीय जीवन में संवेदना के चूकने की कहानी है।
युवा आलोचक डॉ. जगन्नाथ दुबे ने कहा कि मेटा नैरेटिव की जगह आज की कहानी नैनो नैरेटिव की कहानी है। आज कहानी का यथार्थ बदला है लेकिन कहानी ने भी आज के समय के यथार्थ को पकड़ने में कोई कमी नहीं रखी है। श्रीकांत दुबे और शशांक शुक्ल की कहानी आज की समस्याओं को संबोधित करती है।
आलोचक अरुणेश शुक्ल ने कहा कि हमलोग विजुअल से घिरे लोग हैं। हमारे ऊपर परफार्मेटिकल होने का दबाव है। हमारी गतिकी बढ़ गई है। गमलबानी कहानी जिंदगी का रूपक है। यह अपने विन्यास में दाम्पत्य जीवन की भी कहानी है। वहीं शशांक शुक्ल की कहानी कमिटी में आचार्य सफलता और महत्वाकांक्षा के पीछे भागते विश्वविद्यालयी उठापटक की कहानी है।
परिचर्चा के क्रम में डॉ. सुचित्रा अवस्थी ने मिट्टी के रूपक को जिंदगी को बचाने के संदर्भ में समझा वहीं डॉ. राजेंद्र कैड़ा ने इस कहानी को पूरे जीवन को रिड्यूस करके देखने की कहानी के रूप में देखा। कार्यक्रम का संचालन डॉ. कुमार मंगलम ने स्वागत डॉ. अनिल कार्की ने और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. पुष्पा बुढ़लाकोटी ने किया। इस अवसर पर मानविकी विद्याशाखा के अध्यापक मौजूद रहे।