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उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय एवं साहित्य अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में 'उषा किरण खान : व्यक्तित्व एवं कृतित्व' पर राष्ट्रीय परिसंवाद आयोजित

उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय एवं साहित्य अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में 'उषा किरण खान : व्यक्तित्व एवं कृतित्व' पर राष्ट्रीय परिसंवाद आयोजित

Program
उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय एवं साहित्य अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में 'उषा किरण खान : व्यक्तित्व एवं कृतित्व' पर राष्ट्रीय परिसंवाद आयोजित हल्द्वानी, 27 जून 2026। उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय एवं साहित्य अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में शनिवार को "उषा किरण खान : व्यक्तित्व एवं कृतित्व" विषय पर एक राष्ट्रीय परिसंवाद का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में देशभर के प्रतिष्ठित साहित्यकारों, शिक्षाविदों एवं साहित्यप्रेमियों ने सहभागिता करते हुए प्रख्यात मैथिली एवं हिंदी साहित्यकार उषा किरण खान के साहित्यिक अवदान के विविध आयामों पर विस्तार से विचार व्यक्त किए। उद्घाटन सत्र में साहित्य अकादमी के सचिव वरुण गुलाटी ने उषा किरण खान की रचनाओं में लोक संस्कृति एवं महिला सशक्तिकरण के सशक्त चित्रण को उनकी विशिष्ट पहचान बताया। साहित्य अकादमी के हिंदी परामर्श मंडल के सदस्य प्रो. देव सिंह पोखरिया ने कहा कि यह परिसंवाद उत्तर भारत के पाठकों को उनके समृद्ध साहित्य से परिचित कराने का महत्त्वपूर्ण अवसर है। प्रख्यात साहित्यकार प्रो. आनंद प्रकाश त्रिपाठी ने अपने बीज वक्तव्य में कहा कि उषा किरण खान का साहित्य सामाजिक उत्तरदायित्व एवं मानवीय संवेदनाओं का जीवंत दस्तावेज है। मुख्य अतिथि एवं साहित्य अकादमी की उपाध्यक्ष तथा महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा की कुलपति प्रो. कुमुद शर्मा ने कहा कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा को समझने के लिए उनकी कृतियाँ दूबजान और भामती अवश्य पढ़ी जानी चाहिए। अध्यक्षीय उद्बोधन में उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. नवीन चन्द्र लोहानी ने कहा कि उषा किरण खान के साहित्य में भारतीय समाज की ऐतिहासिक चेतना, सांस्कृतिक विरासत और क्षेत्रीय अस्मिता का सशक्त प्रतिबिंब मिलता है। उन्होंने कार्यक्रम के सफल आयोजन हेतु कार्यक्रम संयोजक डॉ. शशांक शुक्ल को बधाई देते हुए विश्वविद्यालय में शीघ्र ही विदेशी एवं क्षेत्रीय भाषाओं के नए पाठ्यक्रम प्रारम्भ किए जाने की जानकारी दी। उद्घाटन सत्र का धन्यवाद ज्ञापन डॉ. शशांक शुक्ल ने किया। प्रथम तकनीकी सत्र की अध्यक्षता प्रो. सविता मोहन ने की। उन्होंने उषा किरण खान के साहित्य में महिला जीवन-संघर्ष तथा सांप्रदायिक सह-अस्तित्व पर विचार रखे। प्रो. सुशील उपाध्याय ने उनकी रचनाओं के मनोवैज्ञानिक पक्ष एवं एक है जानकी में सीता के नवीन चित्रण की चर्चा की। प्रो. सुधीर प्रताप सिंह ने आर्थिक संघर्ष, पलायन और उत्तर-औद्योगीकरण के संदर्भ में उनकी रचनाओं की प्रासंगिकता रेखांकित की, जबकि प्रो. कुमार वरुण ने लोक संस्कृति, ऐतिहासिक दृष्टि एवं गई संस्कृति टूट जैसी कृतियों के माध्यम से उनके साहित्य की विशिष्टता पर प्रकाश डाला। सत्र का संचालन डॉ. अनिल कार्की ने किया तथा धन्यवाद डॉ. राजेंद्र कैड़ा ने किया। द्वितीय तकनीकी सत्र की अध्यक्षता प्रो. रमा (हंसराज कॉलेज) ने की। प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा ने उषा किरण खान को महिलाओं के संघर्ष और लोक जीवन की सशक्त दस्तावेज़कार बताते हुए डूब-धान के माध्यम से भाषाओं के संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया। डॉ. स्वाति चौधरी ने लेखिका के जीवन, पारिवारिक पृष्ठभूमि तथा उनकी सशक्त स्त्री पात्रों की विशेषताओं का विश्लेषण प्रस्तुत किया। अध्यक्षीय टिप्पणी में प्रो. रमा ने कहा कि उषा किरण खान लोक संस्कृति की सजग संरक्षक हैं और उनका साहित्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है। समापन वक्तव्य में प्रो. देव सिंह पोखरिया ने इस प्रकार के आयोजनों की निरंतरता पर बल देते हुए आयोजकों का आभार व्यक्त किया। द्वितीय सत्र का संचालन सुश्री पुष्पा बुडलाकोटी ने किया। दोनों तकनीकी सत्रों में अतिथियों का स्वागत शॉल, ऐपण चित्रकारी एवं पौधे भेंट कर किया गया। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के विभिन्न विद्याशाखाओं के निदेशकगण, शिक्षक, शिक्षणेत्तर कर्मचारी एवं बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।

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